यह कथन कि "वर्तमान समय में अमेरिका यूरोप की बिगड़ी औलाद की तरह काम कर रहा है" एक तीखी टिप्पणी के साथ-साथ एक गंभीर सभ्यतागत आरोप है। यह केवल विदेश नीति की समीक्षा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निदान प्रस्तुत करता है, जो यूरोपीय उपनिवेशवाद के सबसे अंधेरे बीज से उपजी एक विकृति को चिह्नित करता है। वस्तुतः, यह अमेरिका के आत्म-बोध, उसकी विश्व-दृष्टि और उसकी क्रियाओं के बीच की एक बुनियादी विसंगति की ओर संकेत करता है। अमेरिका ने स्वयं को एक "नई दुनिया" और प्रबुद्ध लोकतंत्र के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु उसकी नींव यूरोप के सबसे महत्वाकांक्षी, लालची और कट्टर उपनिवेशवादियों द्वारा रखी गई। यह विरोधाभास ही उसकी त्रासदी का मूल है। जहाँ यूरोप ने स्थानीय स्तर पर लूट और शोषण किया, वहीं अमेरिका ने उन्हीं विचारों को अभूतपूर्व पैमाने और औद्योगिक दक्षता के साथ आगे बढ़ाया। उसने पूरे महाद्वीप का जनसंहार किया और एक औद्योगिक, कानूनीकृत, नस्लवादी दास-प्रथा का तंत्र खड़ा किया, जो पुराने यूरोपीय मॉडलों से कहीं अधिक व्यवस्थित व भयावह था।
इस बिगड़ेपन की घातकता बहुआयामी है। आर्थिक रूप से, विश्व बैंक, IMF और WTO जैसी संस्थाओं के माध्यम से 'संरचनात्मक समायोजन' के नाम पर गरीब देशों की अर्थव्यवस्थाओं का सफाया किया गया। डॉलर के वर्चस्व ने पूरी दुनिया की मेहनत पर एक अदृश्य कर लगा दिया, और आर्थिक प्रतिबंधों को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके आम नागरिकों को तड़पाया गया। सांस्कृतिक घातकता हॉलीवुड और वैश्विक मीडिया के माध्यम से फैली, जिसने एक खोखले, उपभोक्तावादी, हिंसक और अतिव्यक्तिवादी 'अमेरिकन वे ऑफ लाइफ' को विश्व संस्कृति के रूप में थोपकर स्थानीय भाषाओं, परंपराओं और मूल्यों को क्षरण के कगार पर पहुँचा दिया। पर्यावरणीय पापों में, ऐतिहासिक उत्सर्जन में सर्वाधिक योगदान के बावजूद जिम्मेदारी से मुकरना और जीवाश्म ईंधन कंपनियों का पोषण करना, पृथ्वी को जलवायु संकट की ओर धकेलने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। सबसे गहरा घाव नैतिक घातकता का है, जिसने सफलता को केवल धन, शक्ति को दबदबा, न्याय को बदला और स्वतंत्रता को बाजार की पसंद तक सीमित कर दिया है, जिससे मानवीय संबंध तक विषाक्त हुए हैं।
यूरोप से यह बिगड़ापन अधिक खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह तकनीकी वर्चस्व और वैचारिक कठोरता से लैस है। डिजिटल निगरानी, सोशल मीडिया के माध्यम से मानसिक हेरफेर और AI व सैन्य प्रौद्योगिकी में अगुवाई ने एक डिजिटल साम्राज्यवाद का जन्म दिया है। जहाँ यूरोप ने (यद्यपि अपर्याप्त रूप में) आत्म-आलोचना की और कल्याणकारी मॉडल विकसित किए, वहीं अमेरिका का 'विशिष्टता' (एक्सेप्शनलिज्म) का सिद्धांत उसे किसी भी मौलिक आत्म-प्रश्न से मुक्त कर देता है। उसका सैन्य-औद्योगिक संकुल उसकी अर्थव्यवस्था और राजनीति का इतना केंद्रीय अंग बन गया है कि शांति उसके लिए एक आर्थिक संकट का पर्याय बन गई है, जिससे उसे लगातार संघर्ष पैदा करने और फिर उन्हें 'समाधान' करने के एक दुष्चक्र में फँसना पड़ता है। इस प्रकार, वह 'विश्व पुलिस' नहीं, बल्कि एक 'विश्व व्यसनी' बन गया है, जिसे संघर्ष, नियंत्रण और लूट की लत लग चुकी है।
हालाँकि, यह दृष्टि पूर्ण सत्य नहीं है। एक संतुलित दृष्टिकोण यह मानता है कि अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के निर्माण, यूरोप व जापान के पुनर्निर्माण (मार्शल प्लान), और वैज्ञानिक व तकनीकी नवप्रवर्तन में ऐतिहासिक योगदान दिया है। उसके समाज के भीतर सतत आत्म-आलोचना, नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष और एक जीवंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया मौजूद है, जो उसे सुधार की क्षमता प्रदान करती है। वर्तमान यूरोपीय संघ भी, अपनी कमियों के बावजूद, बहुपक्षवाद, कूटनीति और विकास सहयोग पर अमेरिकी एकतरफावाद व सैन्य-केंद्रित दृष्टि से भिन्न एक मॉडल प्रस्तुत करता है। वैश्विक प्रतिक्रिया में, चीन व रूस जैसे देश अमेरिका के 'शक्ति के दुरुपयोग' की आलोचना करते हुए बहुध्रुवीय विश्व की वकालत करते हैं, जबकि कई अन्य राष्ट्र उसकी नीतियों को अंतरराष्ट्रीय कानून व संप्रभुता का उल्लंघन मानते हैं।
अंततः, यह कथन अमेरिकी विदेश नीति के उन पहलुओं पर प्रकाश डालता है जो ऐतिहासिक साम्राज्यवादी मानसिकता से गहरा संबंध रखते हैं। निष्कर्ष यह नहीं है कि अमेरिका बुरा है, बल्कि यह है कि वह एक विरूपित सभ्यता है, जिसने यूरोप के घातक विचारों को अतुल्य शक्ति और एक मिशनरी जुनून देकर पूरी मानवता के लिए एक अस्तित्वगत चुनौती खड़ी कर दी है। जिस प्रकार एक बिगड़ा हुआ बच्चा पूरे परिवार को तहस-नहस कर सकता है, उसी प्रकार अमेरिका अपनी असीमित शक्ति और नैतिक अंधत्व के साथ वैश्विक परिवार के लिए एक गंभीर संकट बना हुआ है। इसलिए, वर्तमान दौर में अमेरिका से अपेक्षा है कि वह वैश्विक नेतृत्व में अधिक जिम्मेदारी, सहयोग और समानता के सिद्धांतों को अपनाए, अपने 'विशिष्टता' के भ्रम से बाहर निकले और आत्म-मंथन करे। केवल तभी वह इस "बिगड़ी औलाद" की छवि से मुक्त होकर एक सहयोगी और स्थिर विश्व व्यवस्था के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। यह कोई राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि सभ्यता के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है।





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